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Rasgulla History: रसगुल्ले की असली जन्मभूमि कौन? ओडिशा और पश्चिम बंगाल के दावों की पूरी कहानी

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रसगुल्ले की उत्पत्ति को लेकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच वर्षों पुराना विवाद आज भी चर्चा में है। जानिए रसगुल्ले का इतिहास, दोनों राज्यों के दावे और जीआई टैग की पूरी कहानी।

नई दिल्ली, 25 जुलाई।भारत की पारंपरिक मिठाइयों का जिक्र हो और रसगुल्ले का नाम न आए, ऐसा शायद ही कभी होता हो। मुलायम, रसीले और मीठे रसगुल्ले ने दशकों से लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई है। हालांकि इसकी मिठास जितनी मशहूर है, उतना ही पुराना विवाद इसकी उत्पत्ति को लेकर भी है। ओडिशा और पश्चिम बंगाल दोनों ही राज्य रसगुल्ले को अपनी ऐतिहासिक देन बताते हैं और वर्षों से इसे लेकर अलग-अलग दावे करते रहे हैं।

ओडिशा का मानना है कि रसगुल्ले की परंपरा भगवान जगन्नाथ मंदिर की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार रथ यात्रा के समापन पर जब भगवान जगन्नाथ श्रीमंदिर लौटते हैं तो माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें विशेष प्रकार का रसगुल्ला अर्पित किया जाता है। इस धार्मिक परंपरा को "नीलाद्री बीजे" कहा जाता है। ओडिशा में इसे पारंपरिक रूप से "रासगोला" या "खीर मोहना" के नाम से जाना जाता है, जिसका रंग हल्का भूरा और स्वाद पारंपरिक शैली का होता है।

दूसरी ओर पश्चिम बंगाल का दावा है कि आधुनिक सफेद और स्पंजी रसगुल्ले का आविष्कार वर्ष 1868 में कोलकाता के प्रसिद्ध मिष्ठान निर्माता नवीन चंद्र दास ने किया था। कहा जाता है कि उन्होंने छेना से तैयार विशेष विधि का रसगुल्ला बनाया, जिसने बाद में पूरे देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली।

इतिहासकारों का मानना है कि दोनों राज्यों की अपनी-अपनी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत रही है। जहां ओडिशा धार्मिक परंपराओं के आधार पर अपने दावे को मजबूत मानता है, वहीं पश्चिम बंगाल आधुनिक रसगुल्ले के व्यावसायिक विकास का श्रेय अपने प्रसिद्ध हलवाई नवीन चंद्र दास को देता है।

इस लंबे विवाद के बीच दोनों राज्यों को अलग-अलग समय पर भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी प्राप्त हुआ। वर्ष 2017 में पश्चिम बंगाल के "बंगाल रसोगुल्ला" को जीआई टैग मिला, जबकि वर्ष 2019 में ओडिशा के पारंपरिक "ओडिशा रासगोला" को भी जीआई टैग प्रदान किया गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि दोनों प्रकार के रसगुल्ले अपनी अलग पहचान और परंपरा रखते हैं।

खाद्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्वाद, बनावट और बनाने की विधि में दोनों रसगुल्लों की अपनी अलग विशेषताएं हैं। बंगाल का रसगुल्ला सफेद, स्पंजी और अधिक रसीला माना जाता है, जबकि ओडिशा का रासगोला पारंपरिक शैली में तैयार किया जाता है और उसका रंग तथा स्वाद थोड़ा अलग होता है।

आज रसगुल्ला केवल एक मिठाई नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। देश-विदेश में इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और दोनों राज्यों की यह विरासत भारतीय खानपान की विविधता को और समृद्ध बनाती है।

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विशेष टिप्पणी

रसगुल्ले को लेकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच वर्षों से चली आ रही बहस भारतीय सांस्कृतिक विरासत की विविधता को दर्शाती है। इतिहास और परंपराओं के अपने-अपने आधार हो सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि दोनों राज्यों ने इस मिठाई को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे विवादों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय मिठाइयों की पहचान वैश्विक स्तर पर लगातार मजबूत हो रही है।

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